मन-स्पंदन

मन की उड़ान को शब्द देने का प्रयास

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मैं चलती हूँ – कविता

Posted On 14 May, 2016 में

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मत रोको मुझे रोकने वालो, मैं चलती हूँ.

मत रोना मुझे चाहने वालो, मैं चलती हूँ.

.

अंश थी मैं वीणावादिनी का, ऋग्वेद की एक ऋचा थी,

रूद्र जटाओं से जो निकली, वो लहर थी सुर सरिता की,

रूप कोई हो, रंग कोई हो, हर स्वरूप में मैं बसती हूँ,

मत रोको मुझे रोकने वालो, मैं चलती हूँ.

.

संगीत मेरा अस्तित्व बनेगा, शब्द मेरी पहचान बनेंगे,

मेरे गीत, ग़ज़ल और कविता, कोटि-कोटि कंठों में सजेंगे,

सुर में, लय में और ताल में, धुन बन कर मैं सजती हूँ,

मत रोको मुझे रोकने वालो, मैं चलती हूँ.

.

नश्वरता में न खोजो मुझको, अंतर्मन में देखो मुझको,

मनसा, वाचा और कर्मणा की दुनिया में खोजो मुझको,

प्रेम, स्नेह, आदर, सम्मान के, रिश्तों में मैं पलती हूँ,

मत रोको मुझे रोकने वालो, मैं चलती हूँ.



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2 प्रतिक्रिया

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jlsingh के द्वारा
15/05/2016

सुन्दर भावपूर्ण कविता आदरणीय डॉ कुमारेन्द्र जी!


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