मन-स्पंदन

मन की उड़ान को शब्द देने का प्रयास

20 Posts

45 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 12314 postid : 1272532

कहाँ से चले थे कहाँ आ गये हैं - कविता

Posted On: 9 Oct, 2016 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

पड़े थे खण्डहर में पत्थर की मानिन्द
उठाकर हमने सजाया है,
हाथ छलनी किये अपने मगर
देवता उनको बनाया है।
पत्थर के ये तराशे बुत
हम को ही आँखें दिखा रहे हैं,
कहाँ से चले थे कहाँ आ गये हैं।
बदन पर लिपटी है कालिख
सफेदी तो बस दिखावा है,
भूखे को रोटी, हर हाथ को काम
इनका ये प्रिय नारा है।
भरने को पेट अपना ये
मुँह से रोटी छिना रहे हैं,
कहाँ से चले थे कहाँ आ गये हैं।
सियासत का बाजार रहे गर्म
कोशिश में लगे रहते हैं,
राम-रहीम के नाम पर उजाड़े हैं जो
उन घरों को गिनते रहते हैं।
नौनिहालों की लाशों पर गुजर कर
ये अपनी कुर्सी बचा रहे हैं,
कहाँ से चले थे कहाँ आ गये हैं।

पड़े थे खण्डहर में पत्थर की मानिन्द

उठाकर हमने सजाया है,

हाथ छलनी किये अपने मगर

देवता उनको बनाया है।

पत्थर के ये तराशे बुत

हम को ही आँखें दिखा रहे हैं,

कहाँ से चले थे कहाँ आ गये हैं।

बदन पर लिपटी है कालिख

सफेदी तो बस दिखावा है,

भूखे को रोटी, हर हाथ को काम

इनका ये प्रिय नारा है।

भरने को पेट अपना ये

मुँह से रोटी छिना रहे हैं,

कहाँ से चले थे कहाँ आ गये हैं।

सियासत का बाजार रहे गर्म

कोशिश में लगे रहते हैं,

राम-रहीम के नाम पर उजाड़े हैं जो

उन घरों को गिनते रहते हैं।

नौनिहालों की लाशों पर गुजर कर

ये अपनी कुर्सी बचा रहे हैं,

कहाँ से चले थे कहाँ आ गये हैं।

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 4.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

1 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments


topic of the week



latest from jagran