मन-स्पंदन

मन की उड़ान को शब्द देने का प्रयास

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उस प्यारे से बचपन में --> कविता

Posted On: 7 Sep, 2012 में

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उस प्यारे से बचपन में –> कविता

हर बात सुहानी लगती थी, उस प्यारे से बचपन में।
हम मौज मस्त में डूबे थे उस प्यारे से बचपन में॥
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वो प्यारे संगी साथी सारे, वे गाँव की धूल भरी गलियां।
ओढ़ के चादर अल्ल्हड़ता की, गलिओं में दौड़ा करते थे।।
खेतों की वो हरियाली से, मन का मतवाला हो जाना।
वो बाग़ बगीचों की मस्ती, पेड़ों पर झूला करते थे॥
सुहानी भोर की प्यारी धुन, ढलती शाम का मस्त समां।
सब कुछ अलबेला लगता था, उस प्यारे से बचपन में॥
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सावन के बलखाते झूलों से, उड़ करके नभ को छू लेना।
काले बादल की रिमझिम में, मस्ती में भीगा करते थे॥
थक करके जब भी आयें हम, माँ के आँचल की छाँव मिले।
दादी से किस्से सुन-सुन कर, सपनों में उड़ते रहते थे॥
पंछी की तरह से उड़ जाना, बहती नदिया जैसा बहना।
सब कुछ कितना मासूम सा था, उस प्यारे से बचपन में॥
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जीवन के तंग झमेलों में फंस, भूले बचपन की मुस्कानें।
न दौड़ सके फ़िर बागों में, फ़िर बारिश में न भीग सके॥
रुपया, पैसा, रोटी, कपड़ा, इस चक्रव्यूह में उलझ गए।
बचपन रूठा, घर भी छूटा, माँ के आँचल में फ़िर सो न सके॥
याद सुहाने बचपन की अब, इस दिल को धड़का देती है।
सिरहन सी मचती है तन में, मन को चंचल कर जाती है।।
थके हुए इस टूटे दिल की, अब तो इतनी ख्वाहिश है।
ले जाए फ़िर से कोई हमें, उस प्यारे से बचपन में॥

@डॉ कुमारेन्द्र सिंह सेंगर



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