मन-स्पंदन

मन की उड़ान को शब्द देने का प्रयास

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असंवेदनशीलता (लघुकथा) - contest

Posted On: 20 Jan, 2014 Contest में

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रास्ते पर भागमभाग मची हुई थी। सभी लोग एक प्रकार की हड़बड़ी सी दिखाते हुए एक ही दिशा में भागे चले जा रहे थे। यह समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक ऐसा क्या हो गया है कि बाजार में इस तरह की अफरातफरी का माहौल बना हुआ है।

दो-एक को रोक कर पूछने की कोशिश की पर कोई न ही रुका और न ही किसी ने रुकने का मन दिखाया। चूँकि मुझे जाना भी उसी ओर था जहाँ से लोग भागमभाग की स्थिति में चले आ रहे थे। मन में एक डर सा पैदा हुआ कि कहीं कुछ ऐसा घटित न हो गया हो जिससे उस ओर जाना घातक हो जाये।

कई लोगों को रोकने की कोशिश में अन्ततः अपने एक परिचित दिखाई दिये। वे मेरे एक-दो बार पुकारने के बाद रुके तो पर ऐसे जैसे कि किसी अतिशय जल्दबाजी में हैं और हम उनका समय नष्ट कर रहे हैं। जब मैंने इस भागदौड़ का संदर्भ जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि उस तरफ सड़क पर एक दुर्घटना हो गई है, एक युवक घायलावस्था में सड़क पर पड़ा है। उसके साथ की युवती उसके लिए मदद को पुकार रही है और कोई पुलिस के लफड़े में नहीं पड़ना चाहता,  इस कारण से….।

इस भागमभाग का पूरा अर्थ समझ में आ गया था। अब मैं भी उस तरफ जाने के बारे में सोच-विचार करने लगा था।

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

OM DIKSHIT के द्वारा
25/01/2014

सेंगर जी, नमस्कार.सही प्रस्तुति…..इंसानियत पर पुलिस का भय भारी पड़ा.

    कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र के द्वारा
    27/01/2014

    आभार आपका.. ये कड़वी सच्चाई है समाज की

vaidya surenderpal के द्वारा
24/01/2014

बहुत ही मार्मिक लघुकथा…।

    कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र के द्वारा
    27/01/2014

    आभार आपका


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