मन-स्पंदन

मन की उड़ान को शब्द देने का प्रयास

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पहचान के साथ ही (कविता) - contest

Posted On: 27 Jan, 2014 Contest में

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अपराध करने के बाद भी
अपराध-बोध का
तनिक भी भान नहीं,
नहीं एहसास कि
वह अपने हाथों से
मिटा चुका है एक सृष्टि को,
वो हाथ जो
झुला सकते थे झूला,
दे सकते थे थपकी,
सिखा सकते थे चलना,
जमाने के साथ बढ़ना,
उन्हीं हाथों ने
सुला दिया मौत की नींद,
मिटा दिये सपने,
अवरुद्ध कर दिया विकास,
बिना उसकी आंखें खुले,
बिना उसके संसार देखे,
बिना अपना परिवार जाने,
समाप्त हो गया उसका अस्तित्व,
समाप्त हो गया एक जीवन,
मिट गई एक मुस्कान
क्योंकि
समाज में आने के पूर्व ही
समाज के कथित ठेकेदार
कर चुके थे उसकी पहचान।

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
30/01/2014

उन्हीं हाथों ने सुला दिया मौत की नींद, मिटा दिये सपने, अवरुद्ध कर दिया विकास, बिना उसकी आंखें खुले, बिना उसके संसार देखे, बिना अपना परिवार जाने, समाप्त हो गया उसका अस्तित्व, समाप्त हो गया एक जीवन, मिट गई एक मुस्कान क्योंकि समाज में आने के पूर्व ही समाज के कथित ठेकेदार कर चुके थे उसकी पहचान। एक बेहतर और सार्थक प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत बधाई सेंगर साब !

nishamittal के द्वारा
28/01/2014

एक अच्छी प्रस्तुति  पर बधाई  कुमारेंद्र जी

    कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र के द्वारा
    28/01/2014

    आभार आपका :)


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