मन-स्पंदन

मन की उड़ान को शब्द देने का प्रयास

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भूख (लघुकथा) - contest

Posted On: 28 Jan, 2014 Contest में

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आलीशान बंगले के विशाल नक्काशीदार दरवाजे के सामने एक छोटा बालक लगातार कुछ मिलने की गुहार लगा रहा था। ‘शायद आज चौकीदार छुट्टी पर था नहीं तो उसने अभी तक भगा दिया होता’ ऐसा सोचते हुए बच्चे ने फ़िर जोर की आवाज़ लगाई। बरामदे में बंधे दोनोविदेशी ‘डोगी’ भौंक-भौंक कर उस बालक को डराने का प्रयास कर रहे थे। अपने प्यारे ‘डोगी’ की परेशान हालत और बालक की कर्कश आवाज़ से झल्ला कर बंगले की मालकिन रजाई की गर्माहट त्याग कर बाहर बरामदे में आई। दोनों प्यारे ‘डोगी’ मालकिन की झलक पाकर शांत हो गए पर बालक कुछ पाने की आस में और तेजी से विनय-भाव से चिल्ला उठा-”मांजी कुछ खाने को दे देना, भूख लगी है, कल से कुछ खाया नहीं है

मालकिन का चेहरा विद्रूप हो उठा। अपने आराम में व्यवधान देख कर वे झल्लाहट में बालक को डांटने, भागने के उद्देश्य से मुंह खोलने वाली थी कि पीछे से सेब खाते चले आए उनके छोटे से पुत्र ने उनकी साड़ी हिलाते हुए जिज्ञासा प्रकट की- “मम्मी, भूख क्या होती है?”

मालकिन की जैसे तंद्रा टूटी। उसने एक निगाह अपने पुत्र पर और एक निगाह दरवाजे के पार खड़े बालक पर डाली; फ़िर अपने पुत्र को गोद में उठा कर उस बालक को कुछ देने के लिए लेन अन्दर चली गई।

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