मन-स्पंदन

मन की उड़ान को शब्द देने का प्रयास

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कहाँ आ गए --> कविता

Posted On: 25 Sep, 2012 Others में

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कविता –> कहाँ आ गए हैं

पड़े थे खंडहर में
पत्थर की मानिंद,
उठाकर हमने सजाया है।
हाथ छलनी किए अपने मगर
देवता उनको बनाया है।
पत्थर के ये तराशे बुत,
हमही को आँखें दिखाने लगे हैं,
कहाँ से चले थे कहाँ आ गए हैं?

.
बदन पर लिपटी है कालिख,
सफेदी तो बस दिखावा है।
भूखे को रोटी,
हर हाथ को काम,
इनका ये प्रिय नारा है।
भरने को पेट अपना
ये मुंह से निवाले छिना रहे हैं,
कहाँ से चले थे कहाँ आ गए हैं?
.

सियासत का बाज़ार रहे गर्म,
कोशिश में लगे रहते हैं।
राम-रहीम के नाम पर
उजाड़े हैं जो,
उन घरों को गिनते रहते हैं।
नौनिहालों की लाशों पर
गुजर कर,
ये अपनी कुर्सी बचा रहे हैं,
कहाँ से चले थे कहाँ आ गए हैं?

@ डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

अजय यादव के द्वारा
26/09/2012

अच्छी रचना| You cannot find peace by avoiding life. जीवन से बच कर आप शांति नहीं पा सकते.[Virginia Woolf वर्जिनिया वूल्फ]

    डॉ कुमारेन्द्र सिंह सेंगर के द्वारा
    28/09/2012

    सही कहा आपने

drbhupendra के द्वारा
25/09/2012

आज का यही सत्य है…. वीभत्स और क्रूर ..

    डॉ कुमारेन्द्र सिंह सेंगर के द्वारा
    28/09/2012

    सही है…जीवन सत्य… आभार आपका


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